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***** सर्जक साहित्यिक संगोष्ठी *****

         साहित्यिक संगोष्ठी आयोजन

दिनांक 10 दिसम्बर, 2011

            स्थान: राजकीय महाविद्यालय ठियोग

           प्रथम सत्र: समकालीन साहित्य और हिमाचाली लेखक (10 बजे से 1 बजे तक )

द्वितीय सत्र: काव्य गोष्ठी (1.30 बजे से 4.30 बजे तक) ! इस रुचिकर कार्यक्रम में आप सब सादर आमंत्रित हैं—साभार-सर्जक आयोजन समिति ठियोग, जिला शिमला ,हिमाचल प्रदेश !NOKIA LIBRARY (16)

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***** सर्जक साहित्यिक संगोष्ठी *****

         साहित्यिक संगोष्ठी आयोजन

दिनांक 10 दिसम्बर, 2011

            स्थान: राजकीय महाविद्यालय ठियोग

           प्रथम सत्र: समकालीन साहित्य और हिमाचाली लेखक (10 बजे से 1 बजे तक )

द्वितीय सत्र: काव्य गोष्ठी (1.30 बजे से 4.30 बजे तक) ! इस रुचिकर कार्यक्रम में आप सब सादर आमंत्रित हैं—साभार-सर्जक आयोजन समिति ठियोग, जिला शिमला ,हिमाचल प्रदेश !NOKIA LIBRARY (16)

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सभी उत्साही, उर्जस्वी लेखकों का इस ब्लॉग पर स्वागत है !

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कविता में प्रकाशित किया गया | टिप्पणी करे

छिन जाने का भय, जो तुम्हारा सुख छीनता है

जन्म से
मृत्यु होने तक
व्यक्ति भय के साये में जीता है
यह भय और कुछ नहीं बस
कुछ छिन जाने का भय है
जो तुम्हारा सुख छीनता है
बच्चा पैदा होने के तुरंत बाद
जोर जोर से रोता है
उसकी दुनिया बदल गयी है
उसे भय लग रहा है कि
वह कहाँ पहुँच गया है
पेट की अँधेरी
नर्क जैसी कोठरी से बाहर
आँखे बंद कर देने वाला प्रकाश भी
उसे भयभीत कर देता है
जीवन में  फिर
रोटी कपड़ा और मकान
छिन जाने का भय भी
व्यक्ति को भयभीत करता है
जीवन का सबसे बड़ा भय
जो हर व्यक्ति को
हर समय और
हर उम्र में
सबसे अधिक डराता है
वह शरीर छिन जाने का भय है
यानि मौत का भय
क्योंकि अपनी जान
हर व्यक्ति को प्यारी होती है
क्या भय से आखिर
छूटा जा सकता है
हाँ परन्तु बड़े कष्ट से
क्योंकि भय का मूल
तुम्हारा अपना ही बुना हुआ
मकड़ी का मोहजाल है
मकड़ी पहले खूब मेहनत कर
जैसे जाला बुनती है
और फिर
उससे छूटने के लिए
छटपटाते हुए
खूब हाथ-पांव मारती है
परन्तु उससे छूटे नहीं बनता
उसे उससे छूटना है तो
वह केवल दो ही स्थितियों में
छूट सकती है
या तो जाला टूट जाए
या फिर उसकी जान छूट जाए
ठीक यही स्तिथि व्यक्ति की भी है
या तो उसका मोहजाल टूट जाए
या उसका शरीर छूट जाए
मोहजाल यानी
वह मायाजाल
जिसका मूल अज्ञान है
अज्ञान, न जानना है
यह न जानना कि क्या ‘है’
और यह कि जो ‘है’
वही सत्य है
सत्य और ज्ञान
पर्याय हैं क्योंकि
सत्य को जानना ही तो
ज्ञान है
और जो है ही नहीं
वह असत्य है
शरीर नश्वर है
आत्मा अनश्वर है
जीवन केवल आत्मा से है
शरीर से नहीं
इसलिए शरीर छूटने से
जीवन नहीं छूटता
केवल पुराना घर छूटता है
और आत्मा फिर से
अपने लिए एक
नया शरीर रुप घर बसा लेती है
इसलिए यह जानना कि
पुराना घर छूटना ही है
और फिर नया घर बसना है
सत्य है, ज्ञान है
और
सत्य जान लेने से
असत्य और
ज्ञान होने से अज्ञान
स्वतः ही मिट जाता है
जैसे प्रकाशमयी सुबह होने पर
अंधकारमयी रात्रि का अँधेरा
स्वतः ही मिट जाता है
और फिर मोह से मुक्त होने पर
सुख की प्राप्ति स्वतः ही हो जाती है !
(अश्विनी रमेश)
कविता में प्रकाशित किया गया | टिप्पणी करे

भ्रष्टाचार की परिभाषा

भ्रष्टाचार के विरुद्ध

जंग लड़ने से पहले
स्पष्ट करना होगा
भ्रष्टाचार का अर्थ
तय करनी होगी इसकी परिभाषा
ताकि भूखा, नंगा और
खुले आसमान के नीचे
सोने वाला इन्सान कहीं
भ्रष्टाचार के अर्थ की
गिरफ्त में न आ जाए
और यदि ऐसा हुआ तो
प्रकृति-रुप सत्य पर भी
लग जाएगा प्रश्नचिन्ह
क्योंकि
भूखा, नंगा और बेघर व्यक्ति
यदि दिन रात मेहनत कर
रोटी, कपड़ा और मकान न कमा पाया
तो होगा सत्य-प्रकृति और
उसके अंश इन्सान पर
घोर अन्याय क्योंकि
रोटी, कपड़ा और मकान
इन्सान की वह कुदरती जरूरत है
जो उसे शरीर मिलने के साथ मिली है
शरीर प्रकृति का अंश है
शरीर टूटेगा तो
प्रकृति-नियम के प्रति
अन्याय होगा क्योंकि
शरीर प्रकृति है
भूखे नंगे और बेघर इन्सान को
इन्सान ही रहने दो
मेहनत करने का उसका हक
और मेहनत करके
कमाए जाने वाले
रोटी, कपड़ा और मकान को
उससे छिनने का प्रयास न करो
वर्ना वह डाका डालेगा और
चोरी भी करेगा
और तुम उसे भी
भ्रष्टाचारी कहोगे क्योंकि
तुमने अपने समर्थन में
जोड़ना है हर व्यक्ति
ताकि बड़ी भीड़ में
तुम्हे कोई आसानी से पहचान न सके
लेकिन याद रखो कि
भूखा. नंगा और बेघर आदमी
अपना शरीर तो बेच सकता है
अपनी आत्मा नहीं
कभी नहीं
वह बिके हुए शरीर होते हुए भी
तुमसे लाख दर्ज़े अच्छा है
क्योंकि उसने अभी तक भी
तुम्हारी तरह अपनी आत्मा नहीं बेचीं
और यह भूल जाओ कि
प्रकृति नियम
तुम्हारी भ्रष्टाचारी के रुप में
पहचान करने में असमर्थ होंगे
प्रकृति में
भूख और वासना का स्वरुप
स्वतः निर्धारित है
और तुम्हारा निर्दयी अन्त
तुम्हारी अपनी ही वासना से होगा
सत्य हमेशा सत्य ही रहेगा
क्योंकि भूख सत्य है
वासना नहीं
और तुम आज भी
हारे हुए हो
और कल भी
क्योंकि तुम वासना यानि
असत्य के रास्ते पर हो
और असत्य की हमेशा
हार होती है और
सत्य की हमेशा जीत !
(अश्विनी रमेश)
कविता में प्रकाशित किया गया | 2 टिप्पणियाँ

वह जो है | स्वार्थ

वह जो है

वह जो है
तुम्हारा सच्चा और प्रियमित्र
तुम्हारे मन के दरवाज़े को
रोज खटखटाता है
अर्धचेतन होकर अर्धनिद्रा में
सोए हुए की तरह
जब तुम अचानक जागते हो
और दरवाज़ा खोलते हो
तो बाहर तुम्हे लगता है कोई नहीं
फिर झट से तुम
दरवाज़ा बंद कर देते हो
वह सच्चा मित्र है न
इसलिए उसको तुम्हारी
इस उपेक्षा का कोई क्षोभ नहीं होता
कभी वह तुमसे रूठता नहीं
इस विश्वास के साथ कि
कभी तो तुम उसे
खोजने का प्रयास करोगे
वह तुम्हे जानता है
मगर तुम उसे नहीं जानते
फिर भी सच्चा मित्र है
अपने कर्तब्य को
इसलिए निभा रहा है कि
कभी तो तुम
उस पर विश्वास करोगे
वह तुम्हे
तुम्हारी उदासी में
व्याकुलता में
अवसाद में
साहस बंधाकर
सदैव तुम्हे प्रसन्न देखना चाहता है
लेकिन तुम हो कि
तर्क देकर हर समय
यह साबित करने में तुले हुए हो कि
वह कोई नहीं है
होता तो, तुम्हे दिखता
तुम्हारी आँखे धोखा नहीं खा सकतीं
तुम्हारे आँख, कान, नाक आदि
समस्त इन्द्रियाँ खुलीं हैं
फिर ये धोखा कैसे खा सकतीं हैं
बस तुम्हारे साथ यही विडम्बना है कि
तुम अपनी आँख अथवा कान आदि
इन्द्रियों का देखा सुना
सच मान बैठते हो
और अपने मन पर
यह दबाव बनाते हो कि
जो तुमने देखा, सुना है
वही तुम्हारे लिए सत्य है
बाकि तुम्हारे लिए सारा झूठ है
यदि आँख का देखा ही सच है तो
ऊँची दिवार के पीछे क्या चीज़ रखी है
यह तो तुम्हे दिखाई नहीं दे रहा
जो दिखाई ही नहीं दे रहा
अथवा कभी दिखाई ही नहीं दिया
मन भी उसकी कल्पना कैसे कर सकता है
यदि तुमने शिमला कभी देखा ही नहीं तो
शिमला कैसा है
इसकी कल्पना भी तो तुम नहीं कर सकते
तो क्या दीवार के पीछे जो घट रहा है अथवा
तुम्हारे सामने खड़ा व्यक्ति क्या सोच रहा है
अथवा क्या महसूस कर रहा है
वह सच इसलिए नहीं है कि
वह तुम्हारी आँख नहीं देख रही है
बस यही तो है कि
तुम्हारी आँख खुली होते हुए भी
नहीं देख सकती
और जो देख सकती है
वह क्योंकि सीमित है इसलिए समग्र सच नहीं
और मन भी वही कुछ तो सोच  सकता है
कभी तुमने आँख, कानादि इन्द्रिओं से
देखा सुना आदि हो
इसलिए तुम सहज ही
यह जान लो कि
तुम्हारी आँखों देखा भी सच नहीं है
जो कभी भी, कहीं भी
अंदर और बाहर घट रहा है
वही मिलाकर सच है
अब तो कम से कम
जब वह दरवाज़ा खटखटाए तो
उसकी उपेक्षा न करना
उसे अंदर, बाहर सब जगह ढूढना
अपने सच्चे और प्रिय मित्र से
दिल से खूब मिलना
इस आनंदमयी अहसास से फिर
तुम्हारा जीवन सफल हो जाएगा
तुम्हारा सच्चा और प्रिय मित्र
जो तुम्हे सदैव चेताता था
आखिर
तुम्हे आज मिल गया
हाँ वह ‘जो है’
वही तो ‘है’
जो तुम्हारी अपनी आत्मा है !
(अश्विनी रमेश)
कविता में प्रकाशित किया गया | टिप्पणी करे

जीवन प्रश्न भी और उत्तर भी | स्वार्थ

जीवन प्रश्न भी और उत्तर भी स्वार्थ
हिन्दी ब्लॉगजगत के बेहतरीन ब्लॉग ‘स्वार्थ’ पर प्रकाशित–जीवन की गहरायी को खोजती यह कविता—-

कविता में प्रकाशित किया गया | टिप्पणी करे

कल और आज

कल और आज

अब कोई चरवाहा
बाँसुरी की सुरीली तान पर
प्रेम गीत नहीं गाता
और न ही कोयल कूकती
चिड़िया भी बहुत कम चहचहाती है
घर की चहेती गाय
जिसका दूध कई पीढ़ियों तक
अमृत पान की तरह पिया
उसके  ढूध न देने के बाद
उसे बेकार समझकर
सडकों पर आवारा घूमने
धक्के और डंडे खाने के लिए
बेसहारा छोड़ दिया
अब कोई बच्चा भावुकता भरे स्वर में
माँ को
अम्मा कहकर नहीं पुकारता
अब खेत में स्वस्थ लहलहाती फसलें नहीं
कीटनाशकों को पीने वाली
नशीली फ़सलें उगती हैं
गांव में बड़े बूढ़ों की
अब कोई चौपाल नहीं बैठती
जिसमे कभी
सुख दुःख की बातें हुआ करती थीं
अब तो घर में
बूढ़ों को बोझ समझकर
बच्चे भी उनको धक्के मारते हैं
और कुत्ते की तरह
उनको दूर से रोटी फेंकते हैं
और जवान ये सब
मौन होकर देखतें हैं
ये सब देखकर
मेरे मन में
बस रोज यही सवाल
घूमता है कि
ये इन्सानियत की नयी उन्नति है
या फिर
उपभोक्तावाद की लादी हुयी बेबसी
कुछ भी हो
मेरे पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं कि
शरीर ढ़ोया जा रहा है
या फिर
जीवन धीरे धीरे बेमौत मर रहा है
यदि उपभोक्तावाद से बेबस व्यक्ति
केवल शरीर ढ़ो रहा है
और चेतना कहीं
अंधकार के गर्त में खो गयी है
तो यही कहना होगा कि
उपभोक्तावाद की इस भयानक आंधी में
यदि तुम चेतना के
दीपक की लौ अपने घर के अंदर भी
जलाए रख सको तो भी
सत्य तुम्हे इस साहस के लिए भी
दुगुनी हिम्मत, ताकत देगा
और तुम यह हिम्मत कर बैठोगे कि
तुम्हे शरीर ढोने वाली
उधार की ज़िंदगी नहीं
बेशक दिन में कुछ पलों के लिए ही सही
मानवीय संवेदना वाली
कुदरत की दी हुई
स्वाभाविक ज़िंदगी जीनी है!
(अश्विनी रमेश)
कविता में प्रकाशित किया गया | टिप्पणी करे

संस्कार

हमेशा
हर बार की तरह
आज भी मैं
अपनी माटी और माँ
की शरण में
अपने गांव और घर पहुंचा हूँ
पुनः अपने भीतर
वही जान फूंकने
जिसे मैंने अपनी माटी
और
माँ के सहारे
अपने संघर्षमयी जीवनपथ पर
चलते हुए
अटूट साहस और धैर्य से
अर्जित करके
जीवन के कठिनतम क्षणों को भी
बड़े धैर्य और शालीनता से
जिया है
पहाड़ों की कोख में बसी
माँ का शरीर
उम्रदराज हुआ तो क्या
हिमालय सा मजबूत
इरादे वाला उसका दिलों-दिमाग
अभी भी डगमगाया नहीं
थका नहीं
पहले की तरह
मुझमे अभी भी
माँ का वही अदब है
इस बार भी थोड़ा
बतियाने के बाद
माँ कह रही है
शाम को खेतों का चक्कर काट आना
फसल देख लेना
कैसी उगी है|
मुझे याद है
बचपन में जब माँ
हम सब बच्चों को
स्कूल की छुटी के बाद
खेत में मक्की काटने
और
आलू खोदने ले जाया करती थी
और जब स्कूल छूटा तो
दोपहर में आराम के बाद
यह अदब कि
माँ अभी आवाज़ देगी
तीन बज गए
क्या सोकर जीवन कट जाएगा
अब उठ जा
खेत जाना होगा
माँ के ये शब्द
हमेशा मुझे
आलस्य की नींद से
जगाते रहें हैं
अपनी माटी और माँ के
एक अटूट संस्कार को
जीने के लिए
सोचता हूँ
गर में अपनी माटी और माँ के
इस संस्कार को न जीता
तो शायद मैं
एक संस्कार रहित
अधूरा व्यक्ति होता
जिसे यह मालूम न होता कि
माटी के अन्न
और माँ के संस्कार का
संघर्षमयी जीवन में
एक व्यक्ति को
सार्थक व्यक्ति बनाने में
कितना अर्थपूर्ण
और
अद्वितीय
योगदान होता है !
(अश्विनी रमेश)

कविता में प्रकाशित किया गया | टिप्पणी करे

कार्य कलात्मकता आनंदमयी जीवन |

किसी भी

कार्य करने से पहले
तुम्हारे मन का
यह पूर्वाग्रही विचार
कि यह कार्य
तुमने पहले भी किया है ,
तुम्हारे लिए कोई नया नहीं
तुम्हारी रचनात्मकता
तुम्हारी कलात्मकता को
दबा देता है
और
हर कार्य नया होते हुए भी
तुम सोचते हो
यह तुमने पहले भी किया है
यदि तुम अभी
दौड़ लगा रहे हो तो
फिर यह नहीं कह सकते कि
कल भी तुम
ठीक ऐसे ही दौड़े थे
जैसा कि आज
दौड रहे हो
यह इसलिए कि
तुम्हारी कल की दौड
और अभी आज की दौड
बिल्कुल भिन्न है
इसका रोमांच, आनंद
बिल्कुल नया
यदि तुम कल की दौड
भूलकर
आज अभी की दौड
एकाग्र, तल्लीन होकर
दौड रहे हो
अनुभव
यानि
अभ्यास का विचार
कला सधने का
विचार न होकर
कला के प्रति
रूचि, ताजगी
खो देने का
और कर्ता को
कार्य के प्रति यांत्रिक बना देने
और
हर नए कार्य को
पुराना समझने का विचार है
कला में
सततता है
कला….
प्रकृति अनुगामिनी
रुपपरिवर्तिता
आनंददायिनी है
कला जीवन का
ऐसा ही पर्याय है
जैसा व्यक्ति में
चल रही साँसे
और
रक्त-धमनियों में
ताज़ा हो रहा रक्त संचार
शरीर के
ताज़ा और प्रफुल्लित
होने का पर्याय है!

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——–प्रकृति गीत——-

शाम ढल चुकी है

अब होगा रात का अँधेरा

कल जब हम मिलेंगे

तब होगा नया सवेरा  !

मौसम ज्यों बदलतें हैं

गर तुम भी यों ही बदलो

तो होगा न मोह का डेरा

फिर होगा न तेरा मेरा !

जिंदगी और क्या है

बस आशाओं का बसेरा

घर चिड़ियों सा घोंसला है

फिर क्या है तेरा मेरा !

जीवन के गीत को तुम

खुशी खुशी गुनगुनाओ

दुश्मनी भूलकर सबको गले लगाओ

ये चार दिन का डेरा

फिर क्या है तेरा मेरा !

कुदरत के नूर हो तुम

कुदरत तुम्हारी किस्मत

जो भी तुमने पाया

कुदरत से ही पाया !

पेड़ों को ही देखो

ये तुमसे क्या है लेते

इनके पास जो भी ये तुमको ही देते

इनकी देन है जो तुम साँस आज लेते !

लेकिन दुःख तो ये है

कुदरत से तुमने कुछ न सीखा

तुमने इसको अपना दास जेसे देखा

स्वामी बनना चाहा अपने अहम को देखा !

तुम्हारे पुरखों ने तो

कुदरत को ही था पूजा

सब कुछ था इसको समझा

वेदों में और क्या था दूजा !

लेकिन उन्नति के नाम पर

तुम अवनति पर हो पहुंचे

विज्ञान के नाम पर अज्ञान ही है पाया

ज्ञान को तुमने दूर है भगाया !

सुबह के भूले अब भी

गर घर को लौट जाओ

तो जीवन संवार लोगे

होगा नया सवेरा

फिर होगा नया सवेरा !

————————— गीत रचना-अश्विनी रमेश (दिनांक२७-६-२०११ को की गयी ) Copyright of this Geet is strictly & solely restricted to Ashwini Ramesh-the writer.

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नग्माये जिन्दगी और दिले-साज है शायरी
ये न हो तो फिर नाशाद नासाज है ज़िंदगी !

शायरी के अलावा और कोई दवाए दिल नहीं
मुफ्त की चीज समझकर छोड़ दी इसीलिए तो पशेमां हो तुम !

                                                                                                    —अश्विनी रमेश !

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ज़िंदगी कोई साहिल नहीं मंज़िल नहीं ये तो सफर है यारब
जिसमे कतराए पानी से समंदर और समंदर से कतरे का सफर करना है !

कुदरत की अजब गज़ब दुनिया में इन्सा सबसे खुदगर्ज़ शय है यारब
पेड़ है जो देता ही है लेता कुछ नहीं इन्सा है जो कुदरत से सिर्फ लेता है देता कुछ नहीं !
                                                                                                                        –अश्विनी रमेश !

                                

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इस बज्मे शायरी को मदहोशी में पहुँच जानो दो ‘रमेश’
लासानी को ये शिकवा न रहे इसमें,मज़ा आया तो क्या आया!

मेरे लिए हर दिन हर लम्हा नया है ‘रमेश’
दस्तूरे-कुदरते दरिया मे बहता हुआ एक कतरा हूँ मैं !

सरूरे शायरी तो मेरी कुदरती फितरत है यारब
ये वोह नशा है जो कभी टूटता नहीं !

                                                                                                 —अश्विनी रमेश !

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जब हम हैं तो जोशे-बज्मे-शायरी है ‘रमेश’
जहाँ हम नहीं वहाँ न जोश है न बज़्म है और नाही शायरी !

पता नहीं क्योँ किसी बहत अपने को तलाशती है हमारी रूह
ये वोह एहसास है जो ताजिंदगी बना रहता है !

इन्सा से कोई उम्मीद है न शिकवा है ‘रमेश’
बस खुदा का शुक्र करतें हैं उसने जो दिया बहत काफी दिया !

                                                                                             –अश्विनी रमेश !

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ये हसरत तो हर कोई रखता है कि इश्क दिवानगी तक पहुंचे
मगर ये ऐसा नशा है जो टूट जाने पर सिर्फ दर्दे-दिल देता है !

मैं एक फ़कीर सी जिंदगी बसर करने में खुश हूँ ‘रमेश’
मुझे बस अब कुछ नहीं चाहिए तेरे दीदार के बाद !

                                                                                    –अश्विनी रमेश !

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